7 दिन हो गए थे होबोजा के बारे में जाने हुए लेकिन अभी तक उसके मतलब को समझ ने पाया था विकास...
समय के साथ वहट्सऐप पर तेजी से चलने वाले संवाद में ब्रेक लग गया था... रिप्लाई की रफ्तार थमने लगी थी... दोनों मिलते तो लगता जैसे बचपन से एक दूसरे को जानते हों... या फिर शायद यह रोशनी की खूबी थी कि विकास को ऐसा महसूस होने लगा...लेकिन जैसे ही दोनों की नजरें अलग होतीं बातों की अहमियत बदल जाती.... सामने तेज आवाज में बोलने वाली रोशनी, वहट्सऐप पर ऑनलाइन होकर भी विकास के लिए खामोश रहने लगी थी... मैट्रो में बिना किसी के परवाह किए खुलकर हांसने वाली रोशनी... मैसेजों को में अब अनजानी सी बनने लगी थी... शायद इन्हीं बातों से परेशान सा हो गया था विकास... स्थिति ऐसी थी कि न उससे कहते बने न उससे हजम करता बने....
समझ नहीं आता कि कैसे रोशनी का इसका कारण पूछे... कि आखिर क्यों असल में सूरज की तेज रोशनी, सामने न होने पर बूझते दिए की लौ के समान हो जाती है... डर था कि किस अधिकार से पूछे... परेशान था कि क्या एक ही रोशनी के ऐसे दो चेहरे भी हो सकते हैं....
परेशानी की वजह जो पता थी... लेकिन उसका समाधान नहीं.... होबोजा हो गया था विकास!!!
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