Saturday, October 10, 2015

बरसात का यह गमगीन मौसम

"रख सकते हो तुम मेरे कंधे पर हाथ" सर के पीछे विकास का हाथों को महसूस कर रोशनी ने कहा.. 
 "अधिकार नहीं है मुझे... I don't have the rights" हाथों को झट से नीचे खींचते हुए विकास ने कहा 
 "अच्छा!! ज़रूरी है कि हर किसी चीज़ के लिए राइट हो ?" 
"हहम्म...हाँ! ज़रूरी है" 

दोनों चुप चाप चलने लगे... दोनों को जल्दी थी। विकास को ऑफ़िस पहुँचना था और रोशनी को घर। लेकिन बावजूद इसके दोनो के क़दम जैसे बढ़ ही नहीं रहे थे। कॉफ़ी हाउस से मेट्रो की तरफ़ बढ़ते उनके क़दम के बीच कहीं ख़ामोशी, कोई सन्नाटा था! इस बीच दोनों के हाथों की छोटी ऊँगली कब एक दूसरे के साथ हो गयी पता ही नहीं चला। राजीव चौक से रोशनी को घर जाने के लिए येलो लाइन की मेट्रो पकड़नी थी तो विकास को ऑफ़िस जाने के लिए स्टेशन के बाहर से ऑटो! रोशनी ने ज़िद्द की कि मुझे मेट्रो स्टेशन के अंदर तक तो छोड़ दो।

 "यार मुझे ऑफ़िस के लिए लेट हो रहा है... मुझे निकलना है..." 
"अच्छा... तो चल तेरे ऑफ़िस चलते हैं। मैं वहाँ से मेट्रो ले लूँगी "
"ठीक है... This is good"
मुँह बनाते हुए रोशनी ने कहा,"But यार... छोड़ मैं यहीं से जा रही हूँ" 
"अबे दो मिनट रूक... " रोशनी को कहते हुए विकास फटाफट ऑटो वालों की और बढ़ गया। "भईया मंडी हाउस चलोगे"... 

 दिल्ली की जिन सड़कों पर गाड़ियों का शोर शराबा होता है, गाड़ियाँ हॉर्न बजाती रहती हैं... आज वहाँ सन्नाटा पसरा था... ऑटो के पिछली सीट पर बैठे दो दोस्त जैसे अजनबी थे।

"क्या हुआ...?" रोशनी ने पूछा 
"कुछ तो नहीं.."
"मतलब तुम बात नहीं करोगे मुझसे.." रोशनी ने दबती आवाज़ में विकास को देखते हुए कहा। ख़ुद को रोशनी की तरफ़ घुमा कर विकास ने कुछ भी बोलने से पहले रोशनी की आँखों को देख लेना बेहतर समझा... उन झील सी आँखों में बादल उतर आए थे! इस वक़्त विकास को ख़ामोशी ही ज्यादा सही जवाब लगी... नम होती उन आँखों को विकास से हटा रोशनी सामने देखने लगी थी... 

"देख यार ऐसे नहीं चल सकता सब..." झुँझलाते हुए विकास ने कहा.. "अबे यार! ये सब ऐसे नहीं चल सकता... हर पल एक दूसरे के साथ होना, ज़्यादातर साथ घूमना-फिरना, हँसना-रोना... देख हम दोनों को बहुत सी चीज़ों पर फ़ोकस करना है, ढेरों काम करना है... मैं नहीं चाहता कि इस बीच हम किसी कश्मकश को लेकर चलते रहे... साफ़ कर हमारे बीच क्या है..." 

रोशनी की आँखें एक टक विकास की आँखों को देख रहीं थी... साँसे भारी थी उसकी, पता नहीं था कब आँखों के बादल बरस पड़ेंगे... एक गहरी साँस से लेकर ख़ुद के अंदर उठ रहे ख़यालों के तूफ़ान को रोक लेना चाहती थी रोशनी.... " यार... जो जैसा चल रहा है उसे वैसे चलने दे ना...."

"यार तू समझने की कोशिश कर... हम ऐसे नहीं चल सकते हैं... कल को ये ना हो कि हमारे बीच क़ुछ था ही नहीं... और अगर कुछ है ही नहीं तो सब नॉर्मल रहे... इतना हो हल्ला क्यों..." रोशनी के हाथ को अपने हाथ से हटाते हुए कहा था...
 

"मतलब अब हम बात नहीं करेंगे, ऐसे रहेंगे भी नहीं" कहते हुए उन झील सी आँखों से पानी बरसने लगा था... हर बार रोशनी की शिकायत होती थी कि ऐसी बरसात मे विकास केवल रुमाल आगे कर देता है... उसके आँसू नहीं पोंछता है, उसे गले नहीं लगता है...

आज भी उसने जेब में हाथ डाल रुमाल निकलना चाहा... लेकिन आज उसके हाथ रोशनी की बंद आँखों पर थे... आँखों की उस बरसात पर फिर पहरा लग गया था... ऐसी बरसात में दोनों बचपन की पोयेम्स और कविताएँ गाने लगते थे...

रोशनी के होंठ किसी मूवी का गाना बुदबुदाने लगे थे... ऑटो विकास के ऑफ़िस के पास पहुँच गया था... बरसात पर पहरा कसने लगा था... 

ख़ुद के लिए, अपने अंदर के तूफ़ान को रोक लेने के लिए रोशनी से एक बार बचपन की पोएम सुनना चाहता था विकास... राजीव चौक से मंडी हाउस का यह सफ़र जल्द ही ख़त्म हो गया... 

विकास ऑटो से उतरा तो पिछली सीट पर बैठी लड़की ने ट्विंकल ट्विंकल लिटल स्टार... गुनगुनाना शुरू कर दिया... ऑटो आगे बढ़ गया... सीट पर बैठी लड़की भीड़ में कहीं खो गयी...  और विकास लेट हो चुका था...

Tuesday, September 8, 2015

ब्लैक एंड व्हाइट जिंदगी

विकास को जबसे पता चला था कि रोशनी का क्रश उसके सीनियर पर है थोड़ हड़बड़ा गया था वो...

उसे इस बात का आभास तो पहले ही हो गया था लेकिन रोशनी की हांमी ने उसकी पुष्टी कर दी...


दो दिनों से जिंदगी ब्लैक एंड व्हाइट हो गई है... बात करना चाहता है विकास उसके साथ लेकिन कर नहीं पा रहा है..

कंफ्यूजन यहां भी उसके दिमाग पर हावी हो गया है। एक बार मन करता है कि क्रश ही तो है उसका... और फिर उसकी अपनी जिंदगी है... तू क्यों टेंशन ले रहा है....

दूसरे ही पल मन में ख्याल आता कि यार जब वो मिलती है तो उसे देखकर ही दिल उसकी ओर खींचा चला जाता है, उसकी हांसी देखते ही रहने का मन करता है और यार जिस तरह से वह बात करती है क्या कुछ भी नहीं है हमारे बीच... न वो वाली बात हो पर दोस्तों वाली बात तो है ही....

अभी यह ख्याल दिमाग में चल ही रहा था कि तीसरे ख्याल ने सिर पर हथौड़ा दे मारा, यार कहीं वो तुझे भी दूसरे सीनियर की तरह यूज न कर रही हो... तू भी तो उसके एक कॉल पर उसके काम के लिए तैयार हो जाता है... उसके एक कॉल पर अपने तमाम काम छोड़ उसे साथ चल पड़ता है....


इन्हीं ख्यालों में फंसकर कुछ उलझ गई है उसकी जिंदगी!!

Thursday, September 3, 2015

तुम यहीं रहोगी अब

1 सितंबर, मंगलवार को दोनों ने साथ लंच किया था ऑफिस के ही कैंटीन में.... रोशनी की इंटर्नशिप बढ़ गई थी... अब वह एक महीने और उसी ऑफिस में काम करने वाली थी जहां विकास उसे देख सकता था.. उसके साथ आ सकता था...

इंटर्नशिप के दौरान विकास की इंटर्नशिप नहीं बढ़ी थी तो उसे बहुत बुरा लगा था... बुरा लगा था कि वह काम करना चाहता है लेकिन उसके पास काम नहीं है... लेकिन शायद उस बुरे से ज्यादा वह खुश था कि रोशनी की इंटर्नशिप बढ़ गई...

लेकिन इतनी सरल कहां होती है जिंदगी... हमेशा की तरह अंदर ही घुट रहा था कि कैसे रोशनी से पूछे की आखिर वहट्सएप और असल जिंदगी के भेदभाव का माजरा क्या है... जहां एक तरफ मन में यह कचोटन थी तो दूसरी ओर इंटर्नशिप बढ़ने की खुशी... 

बातों बातों में कई बार इशारा कर चुका था विकास लेकिन हर बार रोशनी ने उसे बात को नई दिशा में आसानी से मोड़ दिया था... कई कोशिशें खाली गुजर गई थीं.... 


वह रोज विकास को उसके पीछे लगे दिलफेंक आशिकों के किस्से सुनाती... वह भी बेचरा उन आशिकों और अपने बीच एक लाइन खिंचता हुए उसकी बातें सुनता...  


बात बात में ही विकास ने कह दिया था कि तुम अब हमेशा के लिए यहां रहोगी... मालूम नहीं रोशनी इसका मतलब समझ भी पाई थी कि नहीं... 


किसी खट्टारा गाड़ी की धीमी रफ्तार से चलती हुई वहट्सऐप चैट में विकास ने कह दिया था कि रोशनी तुम्हारी नौकरी पक्की है यहां.... 

रोशनी को देखते ही उसे लगा की इसके साथ ऑफिस में काफी टाइम बितने वाला है उसका.. विकास के मन में आई इस बात को आज उसने रोशनी से कहा... और करिश्मा देखिए अगले ही दिन उसे इंटरव्यू के लिए ऑफर आ गया...

डर!

7 दिन हो गए थे होबोजा के बारे में जाने हुए लेकिन अभी तक उसके मतलब को समझ ने पाया था विकास... 

समय के साथ वहट्सऐप पर तेजी से चलने वाले संवाद में ब्रेक लग गया था... रिप्लाई की रफ्तार थमने लगी  थी... दोनों मिलते तो लगता जैसे बचपन से एक दूसरे को जानते हों... या फिर शायद यह रोशनी की खूबी थी कि विकास को ऐसा महसूस होने लगा...लेकिन जैसे ही दोनों की नजरें अलग होतीं बातों की अहमियत बदल जाती.... सामने तेज आवाज में बोलने वाली रोशनी, वहट्सऐप पर ऑनलाइन होकर भी विकास के लिए खामोश रहने लगी थी... मैट्रो में बिना किसी के परवाह किए खुलकर हांसने वाली रोशनी... मैसेजों को में अब अनजानी सी बनने लगी थी... शायद इन्हीं बातों से परेशान सा हो गया था विकास... स्थिति ऐसी थी कि न उससे कहते बने न उससे हजम करता बने....

समझ नहीं आता कि कैसे रोशनी का इसका कारण पूछे... कि आखिर क्यों असल में सूरज की तेज रोशनी, सामने न होने पर बूझते दिए की लौ के समान हो जाती है... डर था कि किस अधिकार से पूछे... परेशान था कि क्या एक ही रोशनी के ऐसे दो चेहरे भी हो सकते हैं.... 

परेशानी की वजह जो पता थी... लेकिन उसका समाधान नहीं.... होबोजा हो गया था विकास!!!

मुलाकात

और बातों ही बातों में होबोजा को 8 दिन हो गए थे...
रोशनी ने बतौर इंटर्न जॉइन किया था विकास का ऑफिस... एक महीने के लिए आई थी वो...  दोनों अलग अलग टीम में थे लेकिन दोनों ने एक दूसरे के बारे में सुना जरूर था।

अलग टीम होने के कारण कभी बात नहीं हो पाई थी.. या फिर कभी दोनों में से किसी ने बात करने के कोशिश ही नहीं की... खैर, शुक्रवार 28 अगस्त को बात शुरू हुई..

उस दिन एक सीनियर मैम ने दोनों को इंट्रोड्यूस करवा दिया था एक दूसरे को... आनन फानन में विकास ने रोशनी को फेसबुक पर फ्रैंड रिक्वेट भी भेज दी और शायद उधर से भी आनन फानन में रिक्वेट एसेप्ट भी हो गई.. दो चार बात में ही दोनों फेसबुक को छोड़ वहट्सएप की नगरी में निकल गए थे... दोनों को एक दूसरे के बारे में जानना था तो इसलिए मैसेज और रिप्लाई की रफ्तार दोनों तरफ तेज थी यहां...

लेकिन विकास को क्या पता था कि जब उसे हो बो जा के बारे में पता चलेगा तो उसे यह भी पता चलेगा कि रोशनी की इंटर्नशिप चंद ही दिनों में खत्म होने वाली है... न जाने क्यों जब इंटर्नशिप खत्म होने के बारे में उसे पता चला तो उसे एक अजीब सा एहसास हुआ....

कुछ दिनों बाद... आज दोनों का कभी करभी साथ आना जान भी शुरू हो गया... मैट्रो में ही मिल लिया करते था वह कभी कभी... वरना विकास की क्या मजाल थी कि ऑफिस में किसी के सामने वह उससे बात भी कर ले....

Tuesday, September 1, 2015

Ho Bo Ja हो बो जा হো বো জ

हो बो जा .... जी हां..
यदि आप मुझ जैसे हिंदी पट्टी क्षेत्र से आते हैं तो आपके लिए 'हो बो जा' कुछ अजीब हो सकता है। मेरे लिए भी था जब मैंने पहली बार यह तीन शब्द सुने थे....

हो बो जा मतलब - अब निकल...

इसका मतलब होता है अब निकल... आसामी शब्द है... मैनें भी पहले नहीं सुना था...

पहली बार मैंने यह 8 सितंबर को सुना था....


राजीव चौक से द्वारका मोड़ की मैट्रो में चढ़ गया था उसके साथ....
 पर आप यकिन मानिए जिस ब्लू लाइन मैट्रो पर सबसे ज्यादा लोग ट्रेवल करते हैं उस लाइन पर मुझे भीड़ का अंदाजा भी न हुआ था। मंडे था... शाम के सात बज गए थे.... लेट भी हो गई वह... शायद मेरी वजह से... या फिर शायद अपनी वजह से... खैर, वह लेट हो गई थी... मंडे इवनिंग का पीक ऑर्स जब मैट्रो में सबसे ज्यादा भीड़ होती है... हम मंडी हाउस से चढ़े... (पता नहीं कब उतरेंगे) घंड़ी के हिसाब से 40 से ज्यादा मिनट नहीं लगते मंडी हाउस से जनकपुरी पहुंचने में.... पर पता नहीं क्यों उस दिन मालूम ही नहीं चला कि 40 मिनट कैसे बीत गए...


इसी मैट्रो में पहली बार सुना था 'हो बो जा'

बिहार की बीज को खाद आसाम में मिली थी पर वह पेड़ बनने दिल्ली आ गया था... या फिर किस्मत ले आई थी... पता नहीं मुझे....

उसी ने बताया था होबोजा का मतलब.... अब चल निकल...

फिर कुछ और भी बोला था उसने... क्या बोला था याद नहीं आ रहा... पर बोलो था... ऐसा ही कुछ था....

बस दो मिनट देना आभी आता हूं... कल वहट्सएप पर भी शायद उसने लिखकर भेजा था.... अभी चेक करता हूं...


'बेसी कोबो नालागे' हां... कहा था न मैंने की उसने वहट्एप पर लिखा कर भेजा था मुझे... यही लिखा था..

Besi kobo nalage..
jyda mat bolo

उसके मैसेज में यही लिखा था...तो मैंने मान लिया...


चलिए बस आज के लिए इतना ही... शायद 40 से ज्यादा घंटे हो गए इन आखों को बंद हुए... अब आराम चाहिए... माफी भी... कि पहले दिन ही ऐसे जाना पड़ रहा है। लेकिन कोशिश रहेगी की कुछ न कुछ जरूर आप तक पहुंचाता रहूं....अभी के लिए हो बो जा!!